जांजगीर-चांपा। जिला पंचायत में इन दिनों एक ऐसा मामला चर्चा का विषय बना हुआ है, जिसने प्रशासनिक पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।जानकारी के अनुसार, जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा अधिकृत चार पहिया वाहन लंबे समय से परिसर में खड़ा-खड़ा जर्जर हो रहा है।
सरकारी वाहन की नियमित देखरेख और उपयोग के अभाव में उसकी स्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है, लेकिन इसके उपयोग को लेकर कोई पहल नहीं की जा रही। इसके विपरीत, जिला पंचायत अध्यक्ष द्वारा अपने निजी वाहन इनोवा का उपयोग प्राथमिक रूप से किया जा रहा है।
जिला पंचायत जांजगीर-चांपा से प्राप्त जानकारी के अनुसार, उक्त इनोवा वाहन (क्रमांक CG04 QG 8506) के लिए जिला पंचायत जांजगीर-चांपा द्वारा प्रतिमाह लगभग 60 हजार रुपये का भुगतान किए जाने की जानकारी सामने आई है।
सूत्रों का दावा है कि यह उपयोग केवल निजी सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए जिला पंचायत की निधि से डीजल-पेट्रोल और यहां तक कि किराया मद में भी भुगतान लिया जा रहा है। यह स्थिति इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि शासन के नियमों में इस तरह के भुगतान का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं बताया जाता।
सूत्र बताते हैं कि इस मुद्दे को लेकर कई बार जिला पंचायत के अंदर असहमति और विवाद की स्थिति बनी है। कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों ने अनौपचारिक रूप से इस पर आपत्ति भी जताई, लेकिन कथित तौर पर दबाव के चलते मामला आगे नहीं बढ़ पाया। अंदरखाने यह भी चर्चा है कि भुगतान प्रक्रिया को लेकर संबंधित शाखाओं में असहजता बनी रहती है, लेकिन उच्च स्तर से हस्तक्षेप के कारण कोई भी खुलकर विरोध नहीं कर पा रहा।
इस पूरे घटनाक्रम ने कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब शासन द्वारा वाहन उपलब्ध कराया गया है, तो उसका उपयोग क्यों नहीं किया जा रहा? यदि किसी कारणवश निजी वाहन का उपयोग किया भी जा रहा है, तो उसके खर्च का वहन सरकारी राशि से किस आधार पर किया जा रहा है? क्या इस संबंध में कोई विशेष अनुमति या आदेश जारी हुआ है, या फिर यह पूरी प्रक्रिया नियमों से इतर चल रही है?
जानकारों का मानना है कि यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह न केवल वित्तीय अनियमितता का मामला बनता है, बल्कि सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग की श्रेणी में भी आ सकता है। ऐसे मामलों में आमतौर पर जांच की आवश्यकता होती है ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और यदि कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई सुनिश्चित हो।
फिलहाल इस पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यही कारण है कि मामला और अधिक चर्चाओं में बना हुआ है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिला प्रशासन या पंचायत विभाग इस मुद्दे को किस गंभीरता से लेता है और क्या इस पर कोई जांच या कार्रवाई आगे बढ़ती है या नहीं।




