जांजगीर-चांपा (छत्तीसगढ़):
चुनाव के समय खुद को किसानों की सरकार बताकर जनता के बीच चीख-चीख कर वादे करने वाली छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार आज उसी किसान के लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन चुकी है। धान खरीदी व्यवस्था में ऐसे नियम थोप दिए गए हैं, जिन्होंने किसानों की मेहनत, पसीना और हक – तीनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
धान खरीदी के नाम पर सरकार ने नियम-धरम का ऐसा जाल बिछा दिया है, जिसमें फंसकर हजारों किसान इस बार अपनी पूरी उपज बेच ही नहीं पाएंगे। अग्रिस्टेक पोर्टल की अव्यवस्था के कारण बड़ी संख्या में किसानों का कैरी फॉरवर्ड तक नहीं हुआ, और अब वही किसान सरकारी केंद्रों से लेकर मिलों तक धक्के खा रहे हैं।
स्थिति यह है कि किसान जब मजबूरी में अपनी उपज मिलों में बेचने निकलता है, तो रास्ते में ही उसके वाहनों को रोककर दस्तावेजों के नाम पर डराया-धमकाया जा रहा है। क्या यही है किसानों का सम्मान? क्या यही वह किसान हितैषी सरकार है, जिसका ढोल चुनाव में पीटा गया था?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि मठ-मंदिरों के धान को भी सरकार लेने से इनकार कर रही है, जबकि इन संस्थानों का पूरा सालाना खर्च धान बिक्री से ही चलता है। इससे साफ है कि सरकार को न किसान की चिंता है, न आस्था की।
कृषि प्रधान जांजगीर-चांपा जिले के किसान आज सबसे ज्यादा परेशान हैं, लेकिन जिले के अधिकारी कुंभकर्णी नींद में सोए हुए हैं। किसानों की समस्याओं पर कोई सुनवाई नहीं, कोई समाधान नहीं—बस आदेश और नियम।
चुनाव के दौरान सरकार ने दावा किया था कि किसानों को गांव में ही भुगतान मिलेगा, लेकिन आज हालात यह हैं कि किसान बैंक-बैंक भटकने को मजबूर हैं। बैंक भी लिमिट कम है का बहाना बनाकर भुगतान को चार-पांच किस्तों में दे रहे हैं। यह सीधा-सीधा किसानों के साथ धोखा नहीं तो और क्या है?
अब किसान पूछ रहा है—
क्या इसी दिन के लिए उसने भरोसा किया था?
क्या मेहनत की कमाई पाने के लिए उसे सड़कों पर उतरना पड़ेगा?
किसानों के सब्र का बांध टूट रहा है। जिस सरकार ने किसान के नाम पर सत्ता पाई, वही सरकार आज किसान के आक्रोश को जन्म दे रही है। आने वाले चुनावों में यही किसान अपने मत से यह तय करेगा कि किसान को केवल नारा समझने वालों को सत्ता में रहने का हक है या नहीं।




